Tribal Festivals In MP That Show You Where The Real Fun Lies 

जनजातियों के पर्व : मध्य प्रदेश के विभिन्न अंचलों में निवास करने वाले जनजाति के लोगों के अपने अपने पर्व होते हैं। हिंदू रीति-रिवाज के त्यौहारों के साथ इनके अपने पर्व होते हैं जिन्हें ये पूरे उत्साह के साथ मनाते हैं। मालवा अंचल में इनका बड़े पर्व के रूप में भगोरिया मनाया जाता है। भगोरिया वैसे भील जनजाति का एक हाट होता है जो होली के पर्व के साथ शुरू होता है, और सात दिनों तक चलता है। 

मालवा के भीलों का यह हाट उनके जीवनसंगिनी को ढूँढ़ने के लिए प्रसिद्ध है। इस हाट के लिए लड़कियां जहां सज संवर कर हाट में पहुंचती है, तो लड़के भी अपने गांव के साथियों के साथ इस मेले में जोश के साथ पहुंचते हैं। यहां पहुंचने के बाद अगर कोई लड़का किसी लड़की को पसंद कर उसके गालों पर गुलाल मल दे तो समझा जाता है कि वह इसे अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहता है, मगर एक तरफा गुलाल काम नहीं आता, गुलाल लड़की द्वारा भी उस लड़के के गाल पर मलना होता है। 

जब दोनों ओर से इस तरह का गुलाल मलने का काम होता है तो परिजन इसे मान लेते हैं और उन दोनों की शादी तय हो जाती है। मालवा की भील और भिलाला जनजाति वर्षा काल में दिवासा पर्व मनाती है। भीलों के इंद्रदेव कालाराणा बाबा और भिलाला जाति के लोगों के इंद्र देव निजामा बाबा होते हैं। 

सावन माह की अमावस्या को मनाया जाने वालो इस पर्व पर दोनों ही जनजाति के लोग एकत्रित होते हैं और इस दिन दोनों ही समुदाय एक दूसरे देवता की पूजा करते हैं। पूजा में बकरे की बलि दी जाती है। यह पूजा अमावस्या की संध्या को होती है। 

मध्य में आने वाले मंडला, बालाघाट, सिवनी, बैतूल, छिंदवाड़ा जिलों में निवास करने वाली जनजातियों के पर्वों में बड़ा पर्व बड़ादेव की पूजा होता है। बड़ादेव की पूजा करने वाले आदिवासी अपने को रावण का वंशज मानते हैं। यह पूजा साजा वृक्ष के नीचे जहां बड़ादेव का स्थान होता है वहां की जाति है। पूजा में क्षेत्र के सभी आदिवासी एकत्रित होते हैं। इसके अलावा इनके मांडवरा, अक्ती, अक्षय तृतीया, बिदरी त्यौहार प्रमुख होते हैं।